क्भी त्कलुफ़ तौ कीजीए,
कभी मुस्कुरआ ही दीजीए
ना गवारा गर सुर्ते आशीक,
तो अप्ने लबो से उल्हाना ही दीजीये .
बदे बे गेरत तेरे इश्क मे जलीम,
तेरी बेरुखी से भी इश्क
है जान_ए_कम्भक्त,

युं तो गुस्ताख आंखो ने शरारत और,

लबोंंं पर हंसी ने लीे अट्ट्खेलीयां  है मगर.

ये इश्क कंही इशारों मै ना दफ़न हो,

मेरी मय्य्त पर तेरे आंचल का कफ़न हो.

युं तो फ़ितरत-ए-आवारा है “परीवरतन”

तु ही रुह-ए-लैला ,  हाल-ए-मजनु है कम्भ्कत.

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