Archive for March, 2011


दील्लगी…..

ईश्क करते है वो कि सुकुन पा सके ,
बैचेन ईश्क ने दी है..बैचेनी ही कमबख्त अब तलक
ना मौज ला सके , ना उन्ही को पा सके..

ना सुकुन है दिनो को , राते उजाली करके..
हर आहट पर उनकी दिल धक से बैठ जाता..
पायल की वो खनक घुंघरु की वो छ्नक..
कानो मे अन – कहे ही वो रसधार घोल जाती.

आवारा सा ईक झोंका ..दामन को उनके छुके..
ईस और जब भी आता घर आंगन महक जाता
अहसासे -महक मे डुबा सा ” परीवर्तन”
फेरे तेरी गली के दिन मे कई लगाता….

करते है इश्क की सुकुं पा सके …. खैर..
कहते सुना हे अक्सर ये मीर-ओ-फकीरो से..
इस ईश्क की गली मे , बैचेनीयों का घर है..
तु दुर से गुजर जा दामन बचा के अपना…

गर मौज ही है हासिल बाज़ार तु निकल जा…
अल्हदा दुआ हे मेरी खुदा खैर बक्शे तुझको..
हो जायेगा तु काफिर ईसका यकीं हे मुझको..
चल साथ चल तु मेरे तुझको खुदा मिलेगा १

गर ईश्क ही हे करना तो उसके सदके मे चला आ.
लब्बो लुवाब होकर तु ईश्क मे बहेगा….
बैचेनी की गली से गर दुर तु रहेगा..
खामोशीयों मे अक्सर पुर सुकुन पा सकेगा

जिदंगी के फेरे , होते है बडे गहरे…,
जो हल्के मे लिया तो डुबना भी तय है,
जो गहरे मे गया तो सुख चैन छिन लेगे….,
जो आ रहा है जैसे तु उसको वैसे लेले..१
ये जिदंगी के फेरे होते है बडे गहरे..,
कभी आसमां से ऊंचे, कभी सागरों से गहरे..
ना सोच तु जिए जा, फेरों पे फेरे लिए जा..
सुख मे दुख मे छांव मे धुप मे, बस मजे तु किए जा !
ये जिदंगी के फेरे होते है बडे गहरे..,
सौम्य साम्य रख तु , संवाद तु किए जा..
गर कोइ जख्म दे तो ,तु जख्म को सिंए जा..
आंसु नही बहाते हर अश्क को पीए जा..
ये जिदंगी के फेरे होते है बडे गहरे..,

ईक यग्य है ये जीवन ,आहुतियां से होगा ..आहुतियां दिए जा!
सुख देना तु सभी को दुख बांटता चले जा..
खुद भी सुखी हुए जा सब को सुखी किए जा,,
ये जिदंगी के फेरे होते है बडे गहरे..,

ईक नन्हा शैतान..
करता तंग सभी को ,
है फिर भी सभी की जान… इक नन्हा शैतान..
सरक सरक के टखने के बल चलता जाता,
पल मे यंहा पल मे वंहा पंहुच जाता ,
जो भी हाथ आता बस बिखर जाता..,
मां ऊठाती बैठक मे बिठा आती..,
फिर पीछे का पीछे रसोई घर मे चला आता..,
बहुत तंग आ जाती तो मुझे ताने भी देती..
उलाहने भी देती लाड भी लडाती जाती..
मां की ममता भी क्या क्या खेल खिलाती..

ईक नन्हा शैतान…करता है तंग, पर है सभी की जान