ईश्क करते है वो कि सुकुन पा सके ,
बैचेन ईश्क ने दी है..बैचेनी ही कमबख्त अब तलक
ना मौज ला सके , ना उन्ही को पा सके..

ना सुकुन है दिनो को , राते उजाली करके..
हर आहट पर उनकी दिल धक से बैठ जाता..
पायल की वो खनक घुंघरु की वो छ्नक..
कानो मे अन – कहे ही वो रसधार घोल जाती.

आवारा सा ईक झोंका ..दामन को उनके छुके..
ईस और जब भी आता घर आंगन महक जाता
अहसासे -महक मे डुबा सा ” परीवर्तन”
फेरे तेरी गली के दिन मे कई लगाता….

करते है इश्क की सुकुं पा सके …. खैर..
कहते सुना हे अक्सर ये मीर-ओ-फकीरो से..
इस ईश्क की गली मे , बैचेनीयों का घर है..
तु दुर से गुजर जा दामन बचा के अपना…

गर मौज ही है हासिल बाज़ार तु निकल जा…
अल्हदा दुआ हे मेरी खुदा खैर बक्शे तुझको..
हो जायेगा तु काफिर ईसका यकीं हे मुझको..
चल साथ चल तु मेरे तुझको खुदा मिलेगा १

गर ईश्क ही हे करना तो उसके सदके मे चला आ.
लब्बो लुवाब होकर तु ईश्क मे बहेगा….
बैचेनी की गली से गर दुर तु रहेगा..
खामोशीयों मे अक्सर पुर सुकुन पा सकेगा

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