ईक नन्हा शैतान..
करता तंग सभी को ,
है फिर भी सभी की जान… इक नन्हा शैतान..
सरक सरक के टखने के बल चलता जाता,
पल मे यंहा पल मे वंहा पंहुच जाता ,
जो भी हाथ आता बस बिखर जाता..,
मां ऊठाती बैठक मे बिठा आती..,
फिर पीछे का पीछे रसोई घर मे चला आता..,
बहुत तंग आ जाती तो मुझे ताने भी देती..
उलाहने भी देती लाड भी लडाती जाती..
मां की ममता भी क्या क्या खेल खिलाती..

ईक नन्हा शैतान…करता है तंग, पर है सभी की जान

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